परम आदरणीय गुरुदेव डॉ. टी. डी. जोशी को भावभीनी श्रद्धांजल
पंजाबी भाषा, साहित्य और संस्कृति के आकाश का एक और चमकता सितारा अस्त हो गया। परम आदरणीय गुरुदेव डॉ. टी. डी. जोशी जी का इस फानी संसार को अलविदा कह जाना पंजाबी भाषा, साहित्य, शोध और सांस्कृतिक जगत के लिए ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी। उनका निधन केवल एक विद्वान शिक्षक का बिछोह नहीं, बल्कि पंजाबी ज्ञान-परंपरा के एक समर्पित साधक, स्नेहशील गुरु और प्रेमपूर्ण इंसान का हमारे बीच से चले जाना है।
डॉ. टी. डी. जोशी जी ने एम.ए. पंजाबी और अंग्रेजी, एम.फिल. तथा पी.एच.डी. जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यताएं हासिल कीं। उन्होंने अपने ज्ञान को केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे पंजाबी भाषा और साहित्य की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने लंबे समय तक डी.ए.वी. कॉलेज, जालंधर के पोस्ट ग्रेजुएट पंजाबी विभाग में अध्ययन और अध्यापन करते हुए अनेक विद्यार्थियों को ज्ञान की रोशनी से प्रकाशित किया।
वह ऐसे शिक्षक थे, जिनके लिए पढ़ाना केवल पेशा नहीं, बल्कि एक पवित्र साधना थी। उनकी शख्सियत में विद्वता की गंभीरता, गुरु का स्नेह और एक सच्चे इंसान की सादगी का अद्भुत मेल था। विद्यार्थियों के लिए वह केवल शिक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, संरक्षक और प्रेरणास्रोत थे। वह अपने विद्यार्थियों को माता-पिता जैसा प्यार, स्नेह और अपनापन देते हुए हमेशा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते रहे।
पंजाबी शोध और साहित्यिक अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान
पंजाबी शोध और साहित्यिक अध्ययन के क्षेत्र में डॉ. जोशी जी का योगदान विशेष महत्व रखता है। पंजाबी प्रगीत के शिल्प पक्षों को समझने और उनका विश्लेषण करने में उनकी पुस्तक ‘पंजाबी प्रगीत शिल्प’ को महत्वपूर्ण और मील का पत्थर मानी जाने वाली रचना के रूप में याद किया जाएगा। इस कृति ने पंजाबी काव्य-अध्ययन को नई दृष्टि और शोध को मजबूत आधार प्रदान किया।
उनकी विद्वता केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित नहीं थी। वह जीवनभर ज्ञान की खोज और उसके प्रसार के लिए सक्रिय रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. टी. डी. जोशी जी ने स्वयं को विश्राम नहीं दिया और पंजाबी भाषा तथा शोध कार्यों से लगातार जुड़े रहे। अपने अनुभव और विद्वता का लाभ नई पीढ़ी तक पहुंचाना उन्होंने अपना दायित्व समझा।
प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों को भी दिया मार्गदर्शन
प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी डॉ. वेद अग्निहोत्री जी के साथ मिलकर उन्होंने आई.ए.एस. और पी.सी.एस. की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को पंजाबी विषय की व्यवस्थित और प्रभावी मार्गदर्शना दी। उनकी अगुवाई में प्रत्येक बैच में विद्यार्थियों की सफलता ने उनकी अध्यापन क्षमता और विषय पर पकड़ को प्रमाणित किया।
वह विद्यार्थियों को केवल परीक्षा पास करने की तैयारी नहीं करवाते थे, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, मेहनत, अनुशासन और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी पैदा करते थे।
डॉ. जोशी जी का व्यक्तित्व सादगी और उच्च विचारों का प्रतीक था। वह अपने ज्ञान का कभी प्रदर्शन नहीं करते थे, बल्कि विनम्रता के साथ हर किसी की सहायता के लिए तत्पर रहते थे। उनके शब्दों में प्रेम, विचारों में गहराई और व्यवहार में अपनापन था। यही कारण है कि उनसे जुड़ा हर विद्यार्थी और सहकर्मी उन्हें केवल एक विद्वान के रूप में नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ इंसान के रूप में याद करेगा।
आज जब डॉ. टी. डी. जोशी जी शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, तब उनकी यादें, उनकी विद्वता, उनकी रचनाएं और उनके द्वारा तैयार की गई विद्यार्थियों की पीढ़ी उन्हें सदैव जीवंत रखेगी। एक सच्चे गुरु की सबसे बड़ी पहचान उसके शिष्य होते हैं और डॉ. जोशी जी के अनेक विद्यार्थी आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल होकर उनकी शिक्षा और संस्कारों की गवाही दे रहे हैं।
उनका जाना निश्चित रूप से एक युग का अंत है, लेकिन उनकी ज्ञान-ज्योति कभी बुझने वाली नहीं। वह पंजाबी साहित्य के इतिहास, पंजाबी शोध की परंपरा और अपने हजारों विद्यार्थियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।
गुरुदेव डॉ. टी. डी. जोशी जी को कोटि-कोटि प्रणाम एवं अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।
-डॉ. सीतल सिंह
जे.सी.डी.ए.वी. कॉलेज, दसूहा






