
विशेष संवाददाता (जागरूक पंजाब) जालंधर : उत्तरी भारत के सबसे हाई-प्रोफाइल और संभ्रांत जिमखाना क्लब में इन दिनों ‘लोकतंत्र’ हांशिये पर है और ‘कुर्सी का खेल’ अपने चरम पर पहुंच चुका है। क्लब के सालाना चुनाव को लेकर स्थिति साफ करने के बजाय जिस तरह से टालमटोल की नीति अपनाई जा रही है, उससे साफ झलक रहा है कि पर्दे के पीछे सत्ता और प्रशासनिक रसूख की बड़ी बिसात बिछ चुकी है। क्लब के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि हार के डर और क्लब पर कब्जा बरकरार रखने की छटपटाहट के कारण ही चुनाव की तारीखों का ऐलान अटकाया जा रहा है।
सत्ता पक्ष की नीयत पर सवाल: पूर्व विधायक रजिंदर बेरी का बड़ा हमला चुनाव में हो रही देरी को लेकर अब राजनीतिक बारूद भी फूट पड़ा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक रजिंदर बेरी ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट डालकर सीधे तौर पर पंजाब सरकार और सत्ताधारी खेमे की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बेरी के इस तीखे बयान ने क्लब की राजनीति में भूचाल ला दिया है। बेरी ने साफ शब्दों में कहा कि पंजाब सरकार की नीयत जिमखाना क्लब का चुनाव कराने की बिल्कुल नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को धता बताकर सत्ता पक्ष अपने चहेतों के जरिए क्लब पर बैकडोर से कब्जा बनाए रखना चाहता है। बेरी ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि क्लब किसी की व्यक्तिगत जागीर नहीं है, यह इसके सदस्यों का है और प्रशासन को तुरंत निष्पक्ष चुनाव की तारीखों का आधिकारिक ऐलान करना चाहिए।
दो धड़ों में सीधी जंग: ‘अचीवर्स’ बनाम ‘प्रोग्रेसिव’ क्लब की सत्ता पर काबिज होने के लिए दो दिग्गजों के गुटों में शह-मात का खेल जारी है:
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अचीवर्स ग्रुप (Achievers Group): मौजूदा व्यवस्था और ढुलमूल रवैये पर सीधा हमला बोलते हुए बदलाव के कड़े रुख के साथ मैदान में डटा है।
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प्रोग्रेसिव ग्रुप (Progressive Group): अपने पुराने रसूख को बचाने और दोबारा काबिज होने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।
दोनों ही खेमों की ओर से लेट-नाइट डिनर बैठकों और गुप्त रणनीतियों का दौर तेज है, लेकिन चुनाव की तारीख न आने से प्रत्याशियों का सब्र अब जवाब दे रहा है।
प्रशासनिक रवैये पर उठते सवाल
सुस्ती या सोची-समझी रणनीति?: क्लब के पदेन अध्यक्ष जिले के डिप्टी कमिश्नर (DC) होते हैं और पूरी चुनावी कमान प्रशासन के हाथ में होती है। लेकिन लगातार खिंचती जा रही प्रक्रिया को देखकर सदस्यों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या प्रशासन पर कोई ऊपरी राजनीतिक दबाव है? अधिकारी भले ही नियमों की आड़ लें, लेकिन चुनाव टालने की यह सुस्ती अब पारदर्शी कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े कर रही है।
बकायेदारों की आड़ में खेल या राजनीतिक सख्ती
Dues के नाम पर फंसा पेच: चुनाव प्रक्रिया रोकने के लिए मेंटेनेंस शुल्क और मेंबर्स के बकाए (Dues) को एक बड़ा हथियार बनाया जा रहा है। लाखों रुपये के पेंडिंग Dues की लिस्टें तैयार की जा रही हैं और डिफॉल्टर्स को नोटिस थमाए जा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि इस वित्तीय जांच और क्लीयरेंस की आड़ लेकर चुनाव प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है ताकि विरोधी खेमे का अंकगणित बिगाड़ा जा सके।



