प्रधानमंत्री की डिग्री सार्वजनिक करने की मांग फिर चर्चा में, दिल्ली हाईकोर्ट में 29 सितंबर को सुनवाई

कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपक ने फिर सोशल मीडिया पर उठाया मुद्दा

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने की मांग एक बार फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके की ओर से इस मुद्दे को उठाया गया है। उनके पोस्ट में सवाल किया गया है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री की डिग्री सार्वजनिक करने से इनकार क्यों किया। हालांकि, अदालत के आदेश को इस रूप में देखना सही नहीं होगा कि कोर्ट ने डिग्री को फर्जी या वास्तविक होने के बारे में कोई फैसला दिया है। विवाद मूल रूप से RTI के तहत शैक्षणिक रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने को लेकर है।

मामले की शुरुआत 2016 में हुई थी। RTI आवेदक नीरज ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से वर्ष 1978 में बीए परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थियों के रिकॉर्ड की जानकारी मांगी थी। इसी वर्ष नरेंद्र मोदी ने भी बीए की परीक्षा पास की थी। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने दिसंबर 2016 में रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति देने का निर्देश दिया था। दिल्ली यूनिवर्सिटी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।

25 अगस्त 2025 को जस्टिस सचिन दत्ता की एकल पीठ ने CIC के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद पर होने से उसकी पूरी व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं हो जाती। अदालत ने शैक्षणिक रिकॉर्ड को व्यक्तिगत जानकारी माना और कहा कि RTI कानून पारदर्शिता तथा सरकारी कामकाज में जवाबदेही बढ़ाने के लिए है, न कि महज जिज्ञासा या सनसनी के लिए निजी रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के लिए।

इस फैसले के खिलाफ RTI कार्यकर्ता नीरज, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद समेत अन्य पक्षों ने अपील दायर की। इन अपीलों में यह सवाल उठाया गया है कि क्या प्रधानमंत्री जैसे सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े रिकॉर्ड को RTI कानून के तहत निजी जानकारी मानकर रोका जा सकता है और क्या इस मामले में व्यापक जनहित का आधार बनता है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में इन अपीलों को लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि मामला केवल सनसनी पैदा करने के लिए उठाया जा रहा है। अदालत ने बाद की सुनवाई में मामले को आगे बढ़ाया और अब डिवीजन बेंच ने अपीलों की सुनवाई के लिए 29 सितंबर 2026 की तारीख तय की है।

इसलिए मौजूदा स्थिति यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट का एकल पीठ का फैसला डिग्री को फर्जी घोषित करने वाला फैसला नहीं है। अदालत ने सार्वजनिक रूप से रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के RTI आदेश को रद्द किया है। इसके खिलाफ अपील अभी लंबित है और 29 सितंबर को इस पर सुनवाई होनी है।

क्या है असली राजनीतिक सवाल?

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अलग-अलग रूप में सामने आ रहे हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता के रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने की मांग करने वाले लोग इसे पारदर्शिता और मतदाताओं के जानने के अधिकार से जोड़ते हैं। दूसरी ओर अदालत के समक्ष यह सवाल रखा गया कि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी की निजी शैक्षणिक जानकारी को केवल उसके पद के कारण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

गुजरात में भी प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित अलग RTI विवाद सामने आ चुका है। मार्च 2023 में गुजरात हाईकोर्ट ने CIC के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री की डिग्री संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। बाद में इस फैसले को चुनौती भी दी गई।

इस पूरे विवाद में एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है—अदालत द्वारा डिग्री रिकॉर्ड सार्वजनिक करने से इनकार किया जाना और डिग्री को फर्जी करार दिया जाना दो अलग बातें हैं। उपलब्ध अदालती कार्यवाही में दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री की डिग्री को फर्जी घोषित नहीं किया है।

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