श्रीनगर में ज्येष्ठा माता के मंदिर में इसी स्वरूप में होते हैं दर्शन
श्रीनगर। सुंदर वादियों के बीच स्थित ज्येष्ठा माता का मंदिर अपनी प्राचीन मान्यताओं और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां लक्ष्मी-विष्णु जी की मूर्ति पर सिर नहीं है। बताया जाता है कि आताताइयों ने मूर्ति को खंडित कर दिया था। वर्तमान में यहां पांच शिवलिंग में विराजमान हैं और उनके बीच भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी जी की बिना सिर के मूर्तियां हैं। मूर्ति पर एक बड़ा सिर दिखाई देता है। मंदिर के पुजारियों ने बताया कि यह गरुड़ महाराज हैं। उनके कंधों पर भगवान विराजमान हैं। आज भी इनकी पूजा की जाती है।
जानें ज्येष्ठा मंदिर का इतिहास
कश्मीर मंडल उन साधु-संतों का घर रहा है, जिनको सांसारिक मोह-माया का कोई लोभ नहीं होता था। पहले यह मंडल एक बहुत बड़ा पर्वतीय सरोवर था, जिसका नाम सतीसर था। कहते हैं कि इस सरोवर का जल कश्यप ऋषि ने अपने योगबल से निकाला था और धरती के इस खंड को उस समय कश्यप मार (कश्यप ऋषि का निवास) के नाम से जाना जाता था, जो अब कश्मीर कहलाता है।
यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव अपने भक्तों की बाधाओं और कष्टों को दूर करने के लिए यहां पर अनेकों रूप में प्रकट हुए। हरिश्वर, सावेश्वर और ज्येष्ठेश्वर (ज्यीठयार) जैसे अधिकतर स्थान इसी झील के किनारे पर हैं।
श्री माता ज्येष्ठा देवी का अस्थापन श्रीनगर से पांच किलोमीटर दूर दक्षिण-उत्तर दिशा में राजभवन मार्ग, डल झील के किनारे गोदावरी पहाड़ी पर विराजमान है। यह तीर्थ अस्थापन 5000 वर्ष पूर्व का एक स्वयंभू तीर्थ है, जिसका वर्णन कश्मीर की राजतरंगिणी और अन्य पौराणिक इतिहास में भी मिलता है।
संक्षिप्त रूप से इस तीर्थ स्थान की रचना क्षीरसागर मंथन के समय की है, जब देवताओं और असुरों में अपना वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास हो रहे थे। जब असुर अमृत कुंभ को छीनकर देवताओं की दृष्टि से भाग रहे थे, तो उन्होंने इस तीर्थ के निकट गुप्त घर, वर्तमान गुप्तकार गोपादरी गुफा में अमृत कुंभ को छिपाया। यही कुंभ ज्येष्ठा देवी के नाम से जलकुंड के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
भगवान महादेव ने अपने योगबल से लक्ष्मी हरण की घटना को जानकर ज्येष्ठा माता और ज्येष्ठ रूद्र (भैरव) को उत्पन्न किया, जो ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष पंचमी का दिन था। इसलिए इस दिन को प्रत्येक वर्ष माता ज्येष्ठेश्वरी के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
माता ज्येष्ठेश्वरी और ज्येष्ठ रूद्र (भैरव) ने असुरों का संहार करके इस अमृत कुंड की स्वयं रक्षा की और वरदान दिया कि जो भक्तजन इस अस्थापन पर भक्ति भाव से आराधना करेंगे, उनकी सभी मनोकामनाएं तथा इच्छाएं पूर्ण होंगी।
कश्मीर में ज्येष्ठ माह के गुरुवारों को विशेष महत्व दिया गया है। अतः वर्ष के प्रत्येक गुरुवार को प्रसाद के रूप में पीले चावल (तहर) माता को अर्पित किए जाते हैं। यह तीर्थ स्थान रिद्धि, सिद्धि और बुद्धि प्रदान करने वाला है। कलयुग में इस तीर्थ का विशेष महत्व है।
सोर्स – ज्येष्ठा देवी प्रबंधक मिट्टी, राज भवन मार्ग, ज्यीठयार, श्रीनगर (जम्मू एवं कश्मीर)

